Lycopodium – Distribution, structure, life history and alteration of generation

Lycopodium 

Distribution Structure life history and Alternation of Generation

Common Name – Clubmoss, Ground pine , trailing evergreen

Classification – 

Division – Microphyllophyta

Subdivision – Lycopsida

Class – – Lycopodiopsida

Order – Lycopodiales

Family – Lycopodiaceae

Genus – Lycopodium

  • Species in world – 400
  • Species in India – 33

e.g-. Lycopodium hamiltonii, L. phyllantum, L. cernum, L. clavatum

  • यह कोमल तथा सदाबहार शाकीय पौधा होता है 
  • यह अधिकांश हिमालय के पूर्वी क्षेत्र में पाई जाती है। 

Lycopodium की जातियों में अनेक विभिन्नताएं पाई जाती है जैसे –

(i ) अधिपादपीय जातियाँ  –

यह अन्य पादपों के तनो से लिपटी तथा लटकती हुई होती है। यह उष्ण कटिबन्धीय क्षेत्रों में पाई जाती है ।

Ex . L. phlegmaria, L. squarrosum, L. Linifolium, L. Funiforme

(ii) झाड़ीदार जातियाँ – 

Ex . L. Lucidulum L. reflexum

(iii) विसर्पी जातियां

Ex.L. clavatum, L. Inundatum, L. Cernum

(iii) आरोही जातियाँ 

Ex. L. Voluble 

नोट – शीतोष्ण जातियाँ नम तथा अम्लीय मृदा में उगती है। 

बीजाणुदभीद (Sporophyte) – Habitat

•यह छोटे शाकीय बीजाणुदभिद पादप होते है

•अधिकांश Tropical (उष्णकटिबंधीय) Species पेड़ो के तने व शाखाओ पर लटकती हुई उगती है (Pendulous epiphytes )eg . L. Phlegmaria, L. Squarroum.

•स्थलीय प्रजातियाँ या तो तने के साथ रेंगते हुए वृद्धि करती है | (eg. L. Clavatum L. Cernum) या  तने के  सटी हुई रहती है

L. Volubile – is a climber

External Morphology (बाह्य लक्षण )

•Lycopodium का sporophyte पादप का शरीर जड़, तना व पत्तियों में विभेदित होता है

•Morphology के आधार पर इसे दो Sub Genera में विभाजित किया गया है

•1. Urostachya  2. Rhopalostachya

1. Sub genus – Urostachya

  • यह आद्य प्रकार का होता है ।
  • यह उधर्व अथवा अधिपादपीय होते है।
  • इसमें तना सीधा खड़ा अथवा लटकता हुआ होता है। 
  • तने में द्विशाखन पाया जाता है
  • मूल तने के आधारीय भाग से उत्पन्न होती है
  • Foliage Leaves तथा sporophylls लगभग समान आकार की होती है ।
  • इसमें sporophylls सघन शंकु (Compact cone ) नहीं बनाती  है
  • इनमे कायिक जनन Bulbils द्वारा होता है
  • Eg. L.selago, L.subulatum, L.compactum, L.phlegmaria

2. Subgenus -Rhopalostachya

  • यह sub genous advance माना गया है ।
  • इसमें तना (Prostate )लेटा हुआ तथा शाखन उदग्र होता है
  • प्रारंभ में निर्मित branch में dichotomous (द्विलाक्षी ) शाखन होता है तथा इनसे उत्पन्न होने वाली शाखाओ में Monopodial  शाखन पाया जाता है
  • सम्पूर्ण तने पर अपस्थानिक जड़े उपस्थित होती है
  • इसमें sporophylls foliage leaves से छोटी होती है
  • इसमें sporophylls strobili बनाती है
  • इनमे कायिक जनन bulbils द्वारा नही होता है 
  • Eg.L.cernum L.clavatum, L.annotium, L.densum, L.obscurum L.innundantum
  •  इसमे तना द्विभाजी शाखित होता है।
  • कभी कभी द्विभाजी शाखाएँ आगे आगे वृद्धि करती रहती है इस तरह का शाखन pseudo monopodial शाखन कहलाता है ।
  • श्यान जातियों में अक्ष पूर्णतः या आंशिक रूप से भूमिगत होता है ।

Root-

  • इसमें सबसे पहले बनने वाली Root ephemeral (अल्पकालिक ) होती है जबकि older plant में adventitious roots होती है
  • Urostachya –में adventitious root, axis के basal part से उत्पन्न होती है
  • Rhopalostachya –में Root या तो एकल या समूह में स्टेम के नीचे से acropetally (ऊर्ध्ववर्ती) रूप से विकसित होते हैं 
  • अपस्थानिक जड़े मुख्यतः तने के pericycle से विकसित होती है
  • लेकिन कभी कभी ये endodermis से भी विकसित होती है
  • यह सीधी cortex से बाहर नहीं निकलती बल्कि यह लम्बवत क्रम में बाहर आती है
  • जिसके कारण stem के T.S. Section में cortex में अनेक जड़े दिखाई देती है
  • इन जडो को cortical root कहा जाता है 

Stem

  • Stem तरुण बेलनाकार तथा rhizomatous होता है
  • यह सीधा खड़ा अथवा लटका हुआ (Urostachya) तथा creeping (Rhopalostachya) होता है
  • यह अव्यवस्थित रूप से (L. annotinum ) अथवा सघन रूप से (L. Abscurus) शाखित होता है
  • इसमें शाखन सामान्यतया dichotomous प्रकार का होता है किन्तु कभी कभी यह monopodial भी होता है
  • असमान प्रकार का शाखन reproductive branch जैसे bulbils अथवा gemmae के बनने के समय होता है

Leaves –

  • पत्तियाँ small simple, eligulate, sessile (अव्रंत ) होती है
  • इनमे पर्ण फलक सकरा तथा आधारीय भाग चौड़ा होता है
  • पत्तियां सपाट होती है लेकिन कभी कभी इनमे दांतेदार MARGIN पाया जाता है (L. Serratum )
  • पर्ण में एकल अशाखित midvein पाई जाती है
  • पर्ण का आकार 2-10 mm का होता है किन्तु L.mandioccanum में पत्तियाँ 25 – 30 mm लम्बी होती है जबकि L.densum में अत्यंत छोटी शल्क नुमा होती है
  • इनमे closely spiral (L.clavatum ) whorled (l.cernuum )अथवा opposite decussate (चतुष्क) पर्ण विन्यास पाया जाता है लेकिन कभी कभी यह अनियमित भी होता है
  • Lycopodium की कुछ जातियों में जिनमे तना चपटा होता है वे dimorphism दर्शाती है
  • इनमे पार्शव शाखा में पत्तियों की 4 vertical row होती है इनमे से दो पार्शव  शखाओ में बढ़ी पंख नुमा पत्तियाँ होती है तथा ventral row में small leaves तथा dorsal row में इंटरमीडिएट size की leaves होती है

Internal Structure of Root

•Root के T.S. में 3 भाग दिखाई देते है

1.epidermis  2.cortex  3. Stele 

1.Epidermis-

  • यह एक परतीय संरचना होती है 
  • यह पतली भित्ति युक्त cell से बनी होती है 
  • इनमे apical भाग में कुछ cell एक कोशिकीय रोम का निर्माण करती है 
  • यह मूल रोम जोड़े के रूप में उत्पन्न होते है 
  • Cortical Root में epidermis कुछ भिन्न प्रकार की होती है 
  • सामान्यत: इसमें मूल रोम absent होते है इनके स्थान पर protuberances उपस्थित होते है 

2. Cortex

  •  Cortex Parenchyma कोशिकाओं से बना होता है ।
  •  Cortex के बाहर की कुछ परतों की  कोशिकाएं मोटी भित्ति वाली हो जाती है तथा यांत्रिक सहारा  प्रदान करती है।
  • यह दो भागो में विभाजित होता है 
  • 1.  Outer Cortex / Hypodermis – यह Sclerenchymatous cell का बना होता है। 
  • 2. Inner Cortex – यह Parenchymatous cell का बना होता है इसमें अन्तरकोशिकीय वायुस्थान नहीं पाए जाते है। 

Endodermis – यह एक स्तरीय ढोलकाकार कोशिकाओं की बानी होती है। 

3. Stele 

  • मूल के केंद्रीय भाग में पाया जाता है जो Protostele होता है 
  • यह एक स्तरीय परिरम्भ से आवरित रहता है 
  • यह तरुण पादप में Monarch तथा परिपक्व पादप में Diarch और Triarch प्रकार का होता है
  • सामान्यतः Diarch के दो समूह पाए जाते है। 
  • इसमें जाइलम C  या U  Shaped  होता है जिस के मध्य Phloem उपस्थित होता है
  • इनकी खुली जगह स्तम्भ से दूर होती है। 
  • Protoxylem C या U के सिरों पर उपस्थित होता है तथा शेष भाग Metaxylem से बना होता है। 

Internal Structure of Stem – 

Stem के T.S. में 3 भाग होते है 

  1. Epidermis
  2. Cortex
  3. Stele

1. Epidermis – 

  • यह Outer Protective Layer होती है 
  • जो एक परतीय रंध्र युक्त ढोलकाकार कोशिकाओं से निर्मित होती है। 
  • इसकी कोशिकाएं मोटी भित्ति युक्त व क्यूटिन युक्त होती है। 
  • Stem की T.S. में Ridge व Grooves पाए जाते है अतः Epidermis गोलाकार नहीं होती है। 

2. Cortex –

  • Cortex की संरचना Lycopodium की Species तथा तने के आकार पर निर्भर करती है। 
  • कुछ Species में यह parenchymatous कोशिकाओं का बना होता है। 
  • बड़े तथा जमीन के अंदर पाए जाने वाले तनों में कोर्टेक्स 3 प्रकार का होता है इसमें Hypodermal क्षेत्र का Cortex Chlorencymatous होता है। 
  • जबकि रम्भ के आस पास पाए जाने वाला कोर्टेक्स Sclerenchymatous होता है। 
  • तथा दोनों के मध्य पाए जाने वाला कोर्टेक्स Parenchymatous होता है। 
  • कभी कभी middle cortex में कुछ भाग नष्ट हो से रिक्त स्थान पाए जाते है। 
  • छोटे तनो में Chlorenchyma कोर्टेक्स या तो हसित होता है या अनुपस्थित होता है। 
  • कभी कभी इनमें कोर्टेक्स Chlorenchyma cell के ढीले रूप से संयुक्त होने से बनता है। 
  • कोर्टेक्स की सबसे Inner Layer Endodermis होती है यह २-6  पंक्तियों युक्त Pericycle से ढकी होती है। यह सुस्पष्ट नहीं होती है इन पर कभी कभी कैस्पेरियन पट्टियाँ पाई जाती है। 

3. Stele-

  • Lycopodium में Protostele  होता है। 
  • जो बाहर 1 – 6 स्तरीय मृदूत्तकिय कोशिकाओं से बने Pericycle से आवरित रहता है। 
  • इसमें Xylem Protoxylem व Metaxylem में बंटा होता है। 
  • इनमे xylem Exarch प्रकार का होता है। 
  • Protoxylem Xylem के किनारे पर शीर्ष भाग पर उपस्थित होता है, जबकि Metaxylem मध्य में उपस्थित होता है। 
  • Metaxylem में सीढ़ीनुमा अथवा pitted thickening पायी जाती है।  जबकि Protoxylem में Spiral अथवा Annular thickening पायी जाती है। 
  • Phloem में केवल Sieve Cell  व मृदुतकीय कोशिकाएं पायी जाती है, इसमें सहायक कोशिकाएं अनुपस्थित होती है। अतः इनमे द्वितीयक वृद्धि नहीं होती। 
  • इसमें xylem व Phloem का Arrangement एक ही जाती में अलग अलग प्रकार का होता है। जैसे की L. Clavatum में Xylem तथा Phloem एकान्तर एकान्तरित पट्टियों में पाए जाते है इनके मध्य Parenchyma उपस्थित होता है , यह पट्टियाँ एकान्तर क्रम में होती है। इस प्रकार का stele Plectostele कहलाता है। 
  • इसी प्रकार L. Serratum में Actinostele पाया जाता है इसमें xylem की आकृति तारेनुमा तथा इन xylem की भुजाओं के मध्य Phloem उपस्थित होता है।  यह भुजाएं Pericycle तक जाती है। 
  • L. Surnum में Xylem तथा Phloem stele में इधर उधर बिखरे होते है, इस प्रकार का stele Mixed Protostele कहलाता है। इनमे Leaf trace मिलते है किन्तु Leaf Gap अनुपस्थित होते है। 

शीर्ष वृद्धि –  

Lycopodium तने की अग्र वृद्धि शीर्ष कोशिकाओं के एक समूह की क्रियाशीलता के परिणामस्वरूप होती है इनमे Periclinal व Anticlinal विभाजन के द्वारा तीन Primary Meristem, Protoderm, Ground Meristem व Procambium बनते है जो बाद में Epidermis, Cortex, तथा Stele बनाते है 

Internal Structure of Leaf – 

  • Lycopodium में पर्ण की epidermis cuticle के द्वारा आवरित रहती है। 
  • इनमे अधिकांश पत्तिया Amphistomatic (उभय रंध्री ) लेकिन विषम पर्णी जातियों की पत्तियां Hypostomatic (अधो रंध्री ) होती है। 
  • इनमे Mesophyll अविभेदित होता है। 
  • इसमें पर्णहरित युक्त कोशिकाएं पायी जाती है, इनके मध्य बड़े अंतरा कोशिकीय अवकाश उपस्थित होते है। 
  • इन पर्णों में मध्य में संकेंद्रित (Concentric ) Vascular Bundle पाया जाता है जिसमे xylem केंद्र में स्थित होता है तथा चारो और phloem से घिरा होता है। 
  • Xylem के Tracheary element (वाहिका तंतुओं ) में वलयाकार तथा सर्पिलाकार स्थूलन पाया जाता है। 
  • Phloem में चालनी कोशिकाएं व मृदुतकीय कोशिकाएं पाई जाती है। 
  • इस बंडल के चारों ओर दृढोतकिय कोशिकाओं से निर्मित Pericycle उपस्थित होता है। 
  • Endodermis सुस्पष्ट नहीं होती है। 
  • एपिडर्मिस व Vascular Bundle के मध्य पर्ण मध्योतक (Mesophyll ) उत्तक भरा रहता है, जो Spongy tissue  व Palisade Tissue में विभाजित नहीं होता है।  

Reproduction in Lycopodium –

  • Lycopodium में reproduction vegetatively तथा Spore द्वारा होता है 

1.Vegetative Reproduction – यह निम्न प्रकार से  होता है –

  1. By – Bulbils 
  2. By- gemmae
  3. By adventitious bud
  4. By fragmentation and decay
  5. By – root tubers

By – Bulbils 

  • Lycopodium की कुछ जातियों में कलिका नुमा संरचना उपस्थित होती है इसे Bulbill  कहा जाता है। 
  • यह तने के शीर्षस्थ भाग पर पत्तियों के अक्ष पर लगती है, यह मोटी व गूदेदार संरचना होती है जो भोजन संग्रहण का कार्य करती है। 
  • यह तने पर चक्राकार क्रम में लगी रहती है जब यह जमीन पर गिरती है तो इससे अनेक अपस्थानिक जड़े निकलती है तथा यह वृद्धि करके नया बीजाणुदभिद Plant बनाती है। 

By- gemmae – 

  • Lycopodium की कुछ जातियों में पत्ती की जगह स्तम्भ के शीर्ष भाग पर पार्श्व बाह्य अतिवृद्धि पाई जाती है यह नाशपाती के आकार की होती है जिसे गैमी कहते है।  
  • इसमें भोजन संग्रहित होता है 
  • प्रतिकूल अवस्था आने पर भी यह जीवित रहती है तथा अनुकूल परिस्थिति में पुनः वृद्धि कर नया पादप बनाती है। 

By adventitious bud

  • लाइकोपोडियम की कुछ जातियों में तने के आधार पर अपस्थानिक कालिका पाई जाती है
  •  यह पादप से अलग होती है तथा अनुकूल परिस्थितियों में नए पादप का निर्माण कर लेती है

By fragmentation and decay

  • यह ज्यादातर लाइकोपोडियम की  विसर्पी जातियों में पाया जाता है। 
  •  इन जातियों में पुराने भाग का अपक्षय होते होते जब यह  द्विभाजी शाखन बिंदु तक पहुंचता है, तो इसमें से 2 नई शाखाएं निर्मित होती है प्रत्येक शाखा नए Plant को उत्पन्न करती है

By – root tubers

  • लाइकोपोडियम की कुछ जातियों में Root  में कालिका नुमा संरचना पाई जाती है जिन्हें Tubercles कहा जाता है
  •  यह Root के शीर्षस्थ  भाग पर पैरेन्काइमा कोशिकाओं के द्वारा भोजन संग्रहण करने से बनती है जब यह Germinate होती है तो Sporophyte Plant को जन्म देती है

By Resting Buds

  • शीत ऋतु में प्रकंद के शीर्ष को छोड़कर शेष संपूर्ण पादप मर  जाता है।  यह शीर्ष भाग विराम कलियों की तरह प्रतिकूल परिस्थितियों में जीवित रहकर अनुकूल अवस्था में पुनः  वृद्धि करके नया पादप बनाता है

Reproduction By Spore

Spore forming Organ – 

  • Spore का निर्माण Sporangium में होता है यह Sporangium Sporophyll की Dorsal  सतह पर एकल रूप में लगती है। 
  • बीजाणु चतुष्फलकीय चतुष्को में व्यवस्थित होते है। 
  • बीजाणुधानिया ज्यादातर बड़े आकार की  (1. 0  से 2. 5 mm ) व्यास की होती है। 
  • यह वृक्काकार नारंगी या पीली पट्ट रहित संवृन्त संरचना होती है। 
  • L. Selego में बीजाणुधानी की भित्ति तीन पर्तीय पाई जाती है सबसे भीतरी पर्त Tapetum कहलाती है जो भोज्य पर्त का कार्य करती है। 
  • केंद्रीय Archesporium में बाहर २ कोशिकाओं की तीन स्पर्श रेखीय पंक्तियाँ पाई जो विभाजित होकर बीजाणु मात्र कोशिका बनती है। 

Sporophyll and Strobilus 

  • यह lycopodium की विभिन्न जातियों में निम्न प्रकार से लगते है 
  • Urostachya की आदिम जातियों में सामान्य पर्ण व बीजाणु पर्ण के आकार व रंग में कोई अंतर नहीं होता इसमें बीजाणु धानियाँ पादप की प्रत्येक पर्ण  पर लगती है। यह बीजाणु पर्ण  संगठित नहीं होती तथा शिथिल रहती है। 
  • L.Selego में बीजाणु पर्ण व सामान्य पर्ण समान होते है .यह पादप आधारीय भाग से बंध्य  होते है . इनमे बंध्य भाग व फलद (Fertile )  भाग एकान्तर क्रम में  स्थित होते है इनमे बीजाणुपर्ण जायदातर हलके रंग  के होते है। 
  • L. falegnameria में स्तम्भ व शाखाओं के दूरस्थ सिरे पर शंकु उत्पन्न होते है। इनमे sporophyll सामान्य पर्णों से छोटे होते है। इनमे sporophyll शीर्ष पर एकत्रित होकर शंकु का निर्माण करते है। इनमे शंकु द्विभाजी शाखित होते है। इनमे शंकु युग्म में उर्ध्व लम्बे वृंत समान शाखाओं के शीर्ष पर लगते है जिन्हे podia कहते है। यह शल्क पत्रों द्वारा ढके रहते है।  शंकु एक शीर्ष मेरिस्टम द्वारा बनता है। इसका रंभिय भाग वर्धि अक्ष के समान ही होता है। 
  • Subgenus Reflostycha  में sporophyll सामान्य पर्ण की अपेक्षा छोटे आकार व हल्के रंग के होते है। इनमे श्वदंति अथवा क्र कंचि किनारा होता है।  िनेम sporophyll सुगठित होकर सुस्पष्ट शंकु का निर्माण करते है। इसके नीचे की पत्तियां बंध्य होती है। यह सरल व द्विशाखित होते है।  L.inundatum L. anotinum , L. Alpinum में शंकु वृंत रहित होते है।  शंकु धारक जातियों को Advance माना  जाता है। 

Development of Sporangia 

  • Sporangium स्तम्भीय अक्ष या Sporophyll  के आधारीय भाग की सतही कोशिकाओं से विकसित होती है। 
  •  यह Eusporangiate प्रकार से विकसित होते है इसमें सतह की २-5 कोशिकाएं विभाजित होकर Sporangial Initial का निर्माण करती है यह कोशिकाएं Periclinal Division करके Outer व Inner Cell बनाती है। 
  • Outer Layer की Cell, Primary  Wall Cell (प्राथमिक भित्ति कोशिका ) कहलाती है।  यह Periclinal व Anticlinal Division करके 3 – 5 पर्तीय Jacket का निर्माण करती है। 
  • Inner cell, Archesporial Initial cell का निर्माण करती जो Primary Sporogenous का कार्य करती है जो अनेक बार समसूत्री विभाजन करके Spore Mother cell का निर्माण करती है। 
  • जब sporangium विकसित हो जाता है तो इसकी आंतरिक भित्ति विभेदित होकर Tapetum का निर्माण करती है , यह Tapetum विकसित हो रही Spore Mother Cell (SMC ) को पोषण प्रदान करती है 
  • जब Sporangium परिपक्व हो जाती है तो spore mother cell पृथक होकर गोलाकार रूप धारण कर लेती है तथा प्रत्येक Spore Mother Cell में अर्धसूत्री विभाजन होता है जिससे बीजाणु चतुष्क का निर्माण होता है। 

Dehiscence of Sporangium 

  • जब Sporangium परिपक्व होती है तो बाहरी सभी Jacket कोशिकाओं को छोड़कर अंदर की सभी जैकेट कोशिकाएं नष्ट हो जाती है। 
  • बाहरी ( outer ) कोशिकाएं वृद्धि करके मोटी भित्ति युक्त हो जाती है जबकी sporangium में शीर्ष से लेकर stalk तक Sporangium एक strip (सिवनी ) का निर्माण होता है जिसे stomium कहा जाता है। 
  • जैकेट कोशिकाओं के सूखने से यह सिकुड़ती है और stomium से फट जाती है तथा बीजाणु बाहर आ जाते है। 

Spore – 

  • Lycopodium में समबीजाणु होते है। 
  • यह एक कोशिकीय तथा इनका आकार छोटा (0.03 -0.05 mm व्यास ) होता है। 
  • यह दो कवचो द्वारा ढका रहता है। 
  • यह आकार में चतुष्फलकीय होते है जिनका आधारीय भाग गोल होता है। 
  • प्रत्येक बीजाणु के शीर्ष पर Triradial उभार होता है जो शीर्ष पर चोंच के समान होता है। यह दो कवचों बाह्य चोल (मोटा व कंटक युक्त ) व अंतश्चोल (पतला ) द्वारा ढका होता है। इनमे पर्णहरित भी पाया जाता है।  
  • इन बीजाणुओं का उपयोग बारूद के reducer के रूप में किया जाता है। 

Germination of Spore and Formation of Gametophytic Plant

Development of Gametophyte Prothallus-

  • जब एक कोशिकीय अगुणित बीजाणु अंकुरित होते है तो वे बहुकोशिकीय gametophyte (युग्मकोद्भिद ) prothallus का निर्माण करते है , जिस पर नर एवं मादा लैंगिक अंग विकसित होते है। 
  • Gametophyte पर लैंगिक अंगों के विकास में 8 महीने से 15 साल तक लगते है। 
  • अंकुरण पानी की उपस्थिति में होता है अंकुरण से पहले बीजाणु जल अवशोषित करके गोलाकार रूप धारण कर लेता है. इस अवस्था में बीजाणु की बाह्य भित्ति टूट जाती है इसमें पहला विभाजन असममित प्रकार का होता है जिससे एक छोटी Rhizoidal  कोशिका  तथा एक बड़ी Cell निर्मित होती है। 
  • Rhizoidal cell लेंस के आकार की रंगहीन कोशिका होती है जो  Prothallus के निर्माण में आगे भाग नहीं लेती है। 
  • बड़ी कोशिका विभाजन करके एक आधारी कोशिका तथा एक बाह्य कोशिका बनाती है। 
  • Outer cell oblique विभाजन करके एक शीर्षस्थ कोशिका तथा अन्य कोशिका निर्मित करती है।  इस अवस्था में Gametophyte का विकास spore में उपस्थित भोजन की सहायता से होता है, जबकि आगे के विकास के लिए इसे Symbiotic Phycomycetes Fungi की आवश्यकता होती है। जो इसके आधारी भाग में प्रवेश कर जाती है और endophytic Mycorrhiza (अन्तः कवक ) का निर्माण करती है। 
  • शीर्षस्थ cell mycorrhiza के स्थापित होने के बाद सक्रिय होती है तथा इसके मुख्य अंगों का निर्माण करती है। 

Lycopodium में तीन प्रकार के Prothallus बनते है। 

  1. Cernum प्रथम प्रकार 
  2. Clavatum द्वितीय प्रकार 
  3. Phlegmeria तृतीय प्रकार 

1 . प्रथम प्रकार-Cernum  –

  • इस प्रकार का Gametophyte autotrophic होता है। 
  • इसका ऊपरी भाग वायवीय तथा आधारीय भाग भूमिगत होता है। 
  • यह उधर्व, गूदेदार बेलनाकार तथा 2 -3 mm लम्बा होता है 
  • यह दो भागों में बंटा होता है –

1. रंगहीन आधारीय भाग – यह जमीन के अंदर धंसा रहता है। 

2. मांसल गूदेदार ऊपरी भाग – 

  • इस भाग में meristematic straind से युक्त Green Lobes होती है  जिनके आधार पर जनन अंग पाए जाते है 
  • यह 6 माह में परिपक्व होता है 
  • यह शीर्ष भाग के नीचे सीमान्त पर स्थित Meristem द्वारा वृद्धि करता है इन meristem कोशिकाओं से जनन अंग उत्पन्न होते है अतः यह क्षेत्र generative zone कहलाता है इस क्षेत्र में कवक मूल अनुपस्थित होते है 

2 . द्वितीय प्रकार Clavatum –

  • इसमें Gametophyte मृतोपजीवी तथा भूमिगत होता होता है। 
  • यह अधिकांशतः भूमिगत जातियों में पाया जाता है। 
  • यह कंद युक्त पाली रहित तिकोना 10 – 20 mm लम्बा होता है।  इसके दो भाग होते है –

1 . आधारीय भाग  – यह तिकोना होता है। 

2 . ऊपरी जनन क्षेत्र -यह निम्न भागों में  बंटा होता है –

  1. Epidermis – यह सबसे बाहरी स्तर होता है जिस पर मूलाभास उपस्थित होते है 
  2. Cortex – यह मृदुतकीय कोशिकाओं का बना क्षेत्र होता है जिसमे कवक मूल (mycorrhizia ) का संक्रमण होता है। 
  3. Palisade Tissue (खम्ब उत्तक) – यहलम्बी कोशिकाओं से बना एक स्तरीय क्षेत्र होता है इन कोशिकाओं में भोज्य पदार्थ संचयित रहता है 
  4. Central fusion Zone – यह भाग षट्कोणीय कोशिकाओं से बना होता है इन कोशिकाओं में  भी भोज्य पदार्थ संचित होता है 
  • ऊपरी चौड़ा क्षेत्र जनन क्षेत्र कहलाता है जो parenchyma कोशिकाओं का बना होता है। इस क्षेत्र में जनन अंग लगते है। इस क्षेत्र में कवक मूल अनुपस्थित होती है।  इसके सीमांत क्षेत्र में meristem उपस्थित रहता है।  इसमें स्त्रीधनी (archegonium ) कोर पर तथा पुंधानी (Antheridium ) केंद्र में लगते है 

3. तृतीय प्रकार Phlegmeria 

  • यह मृतोपजीवी रंगहीन व अनियमित आकार का होता है। 
  • यह अधिपादपीय जातियों में पाया जाता है। 
  • यह एक लाक्षी शाखन प्रदर्शित करता है 
  • यह मूलाभास द्वारा तने से चिपका रहता है। तथा मूलाभास सभी दिशाओं में वृद्धि करते है। 
  • इसका बीच का फुला हुआ भाग कंदयुक्त 2 mm लम्बा होता है जिससे बहुत सी पतली -पतली गोलाकार रंगहीन 1 -6 mm लम्बी शाखाएं सभी दिशाओं में निकलती है जीने Paraphysis कहते है। 
  • इनके बीच के शीर्ष पर जनन अंग उत्पन्न होते है।  
  • इस सम्पूर्ण gametophyte में सहजीवी mycorrhiza उपस्थित होता है। 

Reproduction in Gametophyte 

Gametophyte plant में यह दो प्रकार का होता है –

1 . Vegetative Reproduction 

2 . Sexual Reproduction 

1. Vegetative Reproduction –

1. By Ge maa  – यह gametophyte की शाखाओं पर एकल या समूह में शीर्ष पर लगती है। यह शाखा की एक सतही कोशिका से उत्पन्न होती है। यह छोटी वृन्तयुक्त मुगदराकार (Club shaped ) बहुकोशिकीय मोटी भित्ति युक्त कोशिकाओं से बनी होती है। जिसमे भोज्य पदार्थ संचित रहता है।  यह मात्र पादप से अलग होकर नए Gametophyte का निर्माण करती है उदा. L:phlegmeria

2. By the degeneration of old part -(पुराने भागो के मृत होने तथा सड़ने से )- 

इसमें Gametophyte का पुराना भाग मृत होकर अलग हो जाता है जिससे नई शाखाएं निकलती है जो अलग -अलग gametophyte के रूप में वृद्धि करती है उदा. L. phlegmeria 

जबकि L. inundatum में gametophyte का क्षतिग्रस्त भाग अपस्थानिक कलिकाएं उत्पन्न करता है जो अलग होने पर नया gametophyte बनाती है। 

2. Sexual Reproduction 

Lycopodium का Gametophyte उभयलिंगाश्रयी होता है। इसमें Archegonium तथा Antheridium एक ही Gametophyte  पर स्थित होती है। इसमें Archegonium तथा Antheridium   शीर्ष पर युग्म में लगती है इसमें Antheridium Archegonium से पहले परिपक्व हो जाती है इसे पुंपूर्वी Protandrous  अवस्था कहते हैं।

Antheridium 

लाइकोपोडियम की अधिकतर जातियों में विकसित पपुंधानी Gametophyte पादप के अंदर धँसी होती हैं कुछ जातियों में यह थोड़ी सी बाहर निकली होती है इसके चारों ओर एक स्तरीय भित्ती पाई जाती हैं जिस के शीर्ष भाग पर तिकोनी opercular (प्रच्छदीय) कोशिकाएं होती है इनमें द्वी कशाभिक पुमणु उपस्थित होते हैं।

Development of Antheridia

  • Prothallus से Antheridium  का विकास एक single superficial cell द्वारा होता है, जिसे Antheridial initial कोशिका कहा जाता है। 
  • यह cell periclinal division करके एक बाह्य जैकेट आरम्भिक कोशिका तथा एक आंतरिक Primary Androgonial cell का निर्माण करती है। 
  • Outer Jacket Cell Anticlinal Division करके एक परतीय Antheridial Jacket बनाती है
  • जबकि Primary Androgonial cell अनेक बार विभाजन करती है इसमें विभाजन अनेक तलों पर होता है.जिससे Androgonial कोशिका का एक बहुत बड़ा पिंड बन जाता है .
  • यह कोशिका Androcytes  की तरह कार्य करती है यह Androcytes metamorphosis द्वारा  किडनी नुमा आकार के द्विकशाभिक Anthrozoids का निर्माण करते है। 
  • यह Antherozoids Prothallus के उत्तक में धंसे रहते है। Anthridia के शीर्ष पर एक ढक्क्न नुमा structure होती है जिसे operculum कहा जाता है। 
  • जब operculum द्वारा antheridia में जल प्रवेश करता है तो जैकेट टूट जाती है तथा Antherozoids मुक्त हो जाते है।  

Archegonium

पूर्णतया विकसित Archegonium ग्रीवा तथा अण्डधा में विभाजित होती है अण्डधा Gametophyte में धंसा रहता है तथा ग्रीवा बाहर की और निकली होती है यह ग्रीवा कोशिकाओं की चार पंक्तियों से बनी होती है तथा प्रत्येक पंक्ति तीन से अधिक कोशिकीय ऊँची होती है 

ग्रीवा के अंदर ग्रीवा नाल कोशिकाएं (NCC ) 1 -16 तक  हो सकती है। 

वायवीय  Gametophyte की स्त्रीधनी में एक ही NCC उपस्थित होती है। 

अण्डधा में एक एक अण्ड नाल कोशिका (ECC ) व एक अण्ड होता है अण्डधा Gamtophyte द्वारा घिरा रहता है। 

Development of Archegonia

  • Archegonium का परिवर्धन एक सतही कोशिका से होता है जिसे Archegonial intial cell कहा जाता है। 
  • इसमें  Priclinal Divsion होता है जिससे ऊपरी प्राइमरी cover cell तथा निचली central cell बनती है
  • Central cell में त्रियक विभाजन होता है जिससे एक Primary ventral cell तथा एक primary canal cell का निर्माण होता है। 
  • इस primary canal cell में बारम्बार विभाजन होते है जिससे 4 -8 Neck Canal cell (NCC ) का निर्माण होता है। 
  • Ventral cell दो भागों में बंट कर एक Ventral canal cell तथा दूसरी अण्ड cell का निर्माण करती है 
  • इसी समय upper primary cell विभिन्न विभाजन करके archegonium की नाल का निर्माण करती है 
  • Ventral Canal Cell Gametophyte के tissue में धंसी रहती है तथा archegonium की neck बाहर निकली होती है 

Fertilization

  • इसमें निषेचन प्रक्रिया सामान्य रूप से होती है 
  • Archegonium  के परिपक्व  हो जाने पर इस की NCC व VCC degenerate हो जाती है 
  • Archegonium में cell के degeneration से सिट्रिक अम्ल तथा इसके लवण स्त्रावित होते है जो sperm को archegonium तक पंहुचाने में सहायता करते है। 
  • केवल एक sperm ही अण्ड से निषेचन कर पाता है तथा निषेचन के पश्चात embryo का निर्माण होता है। 

Development  of  Embryo 

  • Embryo   निर्माण मंद गति से होता है। इसमें कई साल लग जाते है। 
  • इसमें प्रथम विभाजन अनुप्रस्थ होता है जिससे एक ऊपरी suspenser cell तथा निचली Embryonal cell बनती है। Suspenser कोशिका आगे विभाजन नहीं करती है। 
  • Embryonic कोशिका में दो उदग्र विभाजन द्वारा चार कोशिकाओं का निर्माण होता है। ये कोशिकाएं अनुप्रस्थ विभाजन द्वारा 8 कोशिकीय संरचना बनाती है जो चार -चार कोशिकाओं के दो सोपान बनाती है। 
  • निचले सोपान की दो कोशिकाएं तना तथा दो कोशिकाएं पत्ती तथा प्राथमिक जड़ बनाती है। 
  • ऊपरी सोपान वाली कोशिकाएं तिरछे विभाजन द्वारा Foot का निर्माण करती है जो चूषकांग का कार्य करता है। 
  • भ्रूण स्वतंत्र Gametophyte से अलग होने तक इससे पोषण प्राप्त करता है। 
  • इसमें प्रथम मूल की उत्पत्ति Exogenous होती है जबकि बाद की सभी मूलों की उत्पत्ति Endogenous होती है अतः  इन्हे cladogenous कहते है। 
  • स्तम्भ वृद्धि करके gametophyte पादप से बाहर आ जाता है तथा इस पर पत्तियां लग जाती है। 
  • प्राथमिक स्तम्भ अल्पजीवी होता है। यह आधारीय भाग से एक अपस्थानिक उधर्व protuberance उत्पन्न करता है जो अंत में क्षैतिज स्तम्भ में बदल जाती है। 
  • तरुण स्तम्भ में Protostele पाया जाता है। जबकि परिपक्व स्तम्भ में Plectostele पाया जाता है। 

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